एक खुली चिट्ठी प्रधानमंत्री मोदी के नाम

राजकुमार अरोड़ा गाइड

आदरणीय महामना मान्यवर मोदी जी आपको इस वर्ष के पहले दिन से ही मन की बात एक आम नागरिक के तौर पर कहना चाह रहा था। कुछ अच्छा होने की आशा की इंतजार करते करते थक कर आज लिख रहा हूं!

*बहुत ही अच्छा लगा था,जब आप पहली बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने से पहले लोकतन्त्र के मन्दिर संसद भवन की सीढ़ियों पर नतमस्तक हुए तो हम सब ने आपकी शालीनता का लोहा माना था।

*आज उसके 80 महीनों बाद आप ही की दिल्ली के द्वार पर 80 दिनों से आप ही के बनाये तीन कृषि कानूनों के विरोध में कम्पकम्पाती ठिठुरन में लाखों किसान आप ही के सामने नतमस्तक है,पर आप तो मस्तक ही उठा के देखने को तैयार नहीं हैं,बारह दौर की वार्ता में वार्ता के भी बारह बज गये पर ज़िद्द के जिद्दीपन का कोई इलाज नहीं निकला।

*जिन अन्नदाता धरतीपुत्रों के लाभ के लिये यह कानून बनाया था,उनको आप की सरकार समझा नहीं पाई,कोई तो कानून में कमी है जो आप डेढ़ वर्ष के लिये रोक लगाने को तैयार हो गये,ऐसा ही विचार व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक होल्ड रखने को कह कर एक समिति बना दी।रोक ही लगानी है अगले चुनाव मई 2024 तक लगा दीजिये या रद्द कर दीजिये,अगली सरकार जो आएगी वो देखेगी?इंकलाबी स्टाइल में कहते हो”एम एस पी था,एम एस पी है,एम एस पी रहेगा” गर ऐसा है तो इसे कानूनी जामा ही क्यों नही पहना देते!आपकी कथनी व करनी पर तो उनको विश्वास ही नहीं,कुछ ऐसा कीजिये न!विश्वास पैदा हो जाये। इस आंदोलन में 220 किसानों की मौत हो गई,कुछ ने आत्महत्या कर ली पर आपने व अपने को दूसरों से अलग कहने वाली आपकी भाजपा ने संवेदना के रूप में एक शब्द नहीं कहा। पूरी भाजपा को तो आपने मोदीमय कर दिया है, वो आप की लाइन से अलग कहाँ जाएगी।

आप इन किसान आंदोलनकारियों को कुटिल मुस्कान के साथ भरी संसद में परजीवी कह रहे हैं,आन्दोलनजीवी कह रहे हैं, भूल गए कितने ही आंदोलन करके आप दो से तीन सौ दो तक पहुँचे हैं। सरदार पटेल ने बारदोली सत्याग्रह किया,महात्मा गाँधी ने तो आज़ादी आंदोलनों के बल पर दिलाई।आप की तो पूरी भाजपा ही परजीवी है,जो अपने बलबूते पंचायत का चुनाव तक नहीं जीत सकते वो आप के नाम की वैतरणी पर बैठ कर अधिकांश विधायक व सांसद बन जाते हैं।

*आप के राष्ट्रीय प्रवक्ताओं ने ऐसी महारत हासिल कर ली है,विषय कोई भी हो आप के ही गुणगान से बहस शुरू होती है, उसी पर ही खत्म। आप बार बार आपातकाल की याद दिला कर कांग्रेस को घेरने की कोशिश करते हैं, अघोषित आपातकाल तो आज भी है।

सारे राष्ट्रीय चैनल तो आप व आपकी पार्टी का ही गुणगान करते नज़र आते हैं,जब हर चेनल पर आप को ही पाना है तो रिमोट का भी क्या फायदा!खोजी पत्रकारिता को तो खोजना पड़ रहा है। सोशल मीडिया कुछ हद तक वास्तविकता दिखा रहा है तो उसके दमन के भी किस्से बढ़ रहे हैं। आप का गुणगान करने व लाभ पहुंचाने वालों को राज्यसभा पहुंचा दिया जाता है कुछ मंत्री भी बन जाते हैं।

*80 दिनों से दिल्ली के रास्ते 12 लेयर की बारकेडिंग लगा कर बन्द हैं, सड़कें खोद कर कंक्रीट की दीवारें खड़ी कर दीं।ये किसान युद्ध करने नहीं आप से बात करने आये हैं।आमजन इतने दिनों से रास्ते बन्द होने से कितना परेशान हैं।

सुप्रीम कोर्ट भी कोई संज्ञान नही ले रहा।यह बात सही है कि 26 जनवरी को जो हुआ वो गलत था, राष्ट्रीय भावनाओं के खिलाफ था। ऐसे राष्ट्रीय पर्व के दिन इतने उच्च स्तरीय सुरक्षा प्रबन्धों के बीच कुछ दिग्भ्रमित लोग असमाजिक तत्वों के भड़काने पर हज़ारों की सँख्या में लालकिले तक पहुंच गए तो क्या यह आपके गृह मंत्रालय, खुफिया तंत्र की नाकामी नहीं, खैर गृह मंत्री शाह तो आज शहंशाह हैं, नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र देने का चलन तो शास्त्री जी के बाद खत्म ही हो गया। जब पहली रात को कुछ होने का अंदेशा था तो बहुत कुछ किया क्यों नहीं। किसान नेता तो कह ही रहे हैं कि जिन्होंने गलत किया उन्हें कानून के हिसाब से सख्त सजा दो।

*दीवारें खड़ी न करके पुल बनाइये,आप तो कहते हैं मैं किसानोँ से एक फोन कॉल की दूरी पर हूं तो अब हठधर्मिता छोड़ कर स्वयं बात कर लीजिये न। सिर्फ दाढ़ी बढ़ाने से क्या होगा,दिल बड़ा कर बडप्पन भी दिखाइये,इन्हीं किसानों ने ही वोट दे कर आपको यहाँ पहुंचाया है,अपनों से बात करने में हिचक क्यों।

*आप यह कहते हैं किसानोँ को भृमित किया जा रहा है। राष्ट्र के मुखिया होने के होने के नाते उनका भृम दूर करना क्या आपका कर्तव्य नही? कांग्रेस को कोस कोस कर आप सत्ता में आ गये पर अब तो जनता अपने को कोस रही है कि हम भी भृम में थे,’अच्छे दिन आएंगे’ के बुलन्द आवाज़ में नारे सुन आशान्वित हो कर इनको लाये थे,अब सोचते हैं कि इससे तो वो बुरे दिन ही अच्छे थे। आज पेट्रोल डीज़ल की कीमत शतक छूने को है, आवागमन महंगा होगा, महंगाई और बढ़ेगी।रसोई गैस साढ़े चार सौ से साढ़े सात सौ तक पहुँच गई, खाने पीने के सामान व फल सब्जियों की कीमत बेकाबू है, जमाखोरी व भृष्टाचार पर कोई लगाम नहीं बेरोजगारी बढ़ती ही जा रही है।आम आदमी को तो स्वयं को जीवित रखने के लिये ही भरपूर संघर्ष करना पड़ रहा है।

*आप के राज में अपराध बढ़ रहे हैं, कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, एक विकास दुबे को तो लोग भूले नहीं थे,हाल ही में कासगंज में नया विकास दुबे आ गया,शराब माफियाओं ने छापा मारने गई पुलिस को ही बंधक बना कर मार डाला वो भी आपके सख्त योगी राज वाले उत्तरप्रदेश में! हाथरस वाली सनसनीखेज घटना आज भी कहाँ भूली!जब सख्त राज में दिन प्रतिदिन ये हाल है तो बाकी जगह क्या होगा?आज देश की हालत अंधेरे चौराहे पर अँधे कुँए जैसी हो गई है।

*आज आप सत्ता में हैं, विपक्षी दलों के जबरदस्त बिखराव के कारण जबर्दस्ती आप ही सत्ता में आ जायेंगे पर लोगों के मन पर राज तो तभी कर पाएंगे जब आप अपनी जनता के मन की बात भी नम हो कर मन से सुनेंगे। आप हमेशा स्वयं को रुंधे गले से भावनात्मक दिखा कर लोगों की भावनाओं से कब तक खेलते रहेंगे? दूसरों के घर काम कर गुजारा करने वाली एक माँ के चाय बेचने वाले बेटे को दो बार प्रधानमंत्री बना दिया पर जनता को भी कुछ चाह है आपसे! आप उनकी चाहत का कुछ तो ख्याल कीजिये। घोर गरीबी से उबर के लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने,उन्होंने देश पर ही नहीं ,अपनी सादगी से देशवासियों के दिलों पर राज किया! जब उनका देहांत हुआ तो उनकी मारुति कार का भी बीस हज़ार ऋण बाकी था। आप तो अपने हज़ारों सफारी सूट,कुर्ते,जैकेट से चर्चा में रहते हैं।आपका निवास व कार्यालय तो शानशौकत से भरपूर है।

*आप जब सत्ता में आये तो आप की छवि को आपके सिपहसालारों ने एक दिव्य पुरूष के रूप में स्थापित कर दिया तो लोगों को लगा कि अब देश बदल जायेगा कायाकल्प ही हो जाएगा,बल्ले बल्ले हो जाएगी पर अपने को अलग कहने वाली भाजपा ही कांग्रेसमय हो गई। नोटबन्दी में तो कालेधन वालों का पैसा ही सफेद हुआ,आम जन तो तब की परेशानियों से अब तक नहीं उबरा। बिना पूर्व तैयारी के कोरोना काल में एकाएक किये लॉक डाउन से करोड़ों मज़दूर,कर्मचारी बेघर हो गए,रोजगार छिन गए। योग्यता से कहीं कम वेतन पर काम करने को आज भी मजबूर हैं।

  • आप ही की नीतियों के कारण बैंकों का एन पी ए और बढ़ गया, बैंक, रेलवे, हाई वे, रोडवेज, हवाई सेवा, बीमा कम्पनियां आदि सब कुछ निजीकरण की राह पर है। कितने ही विजय माल्या और नीरव मोदी और पैदा हो गए। आज एक और कोऑपरेटिव बैंक के लेनदेन पर 6 माह के लिये रोक लगा दी।पहले बैंकों का विलय एक बड़े बैंक में किया अब उसे भी प्राइवेट करने की तैयारी! जी एस टी में इतने परिवर्तन हो गए कि पुराना स्वरूप ही न जाने कहाँ गया, अभी तो यह दौर जारी है। लगता है आपकी सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ हो चुकी है उसे स्वयँ समझ ही नहीं आ रहा कि क्या करें ,किस दिशा में जाये। प्रचण्ड बहुमत के बावजूद सब कुछ आप पर ही तो आश्रित है!क्या कमाल है!

*दूसरे दलों के भृष्टाचारी भाजपा में आते ही पवित्र सदाचारी कहलाने लगते हैं।कुछ माह बाद ही पश्चिमी बंगाल में चुनाव है,ममता राज को उखाड़ फेंकने की चाह में तृणमूल के थोक में विधायक पवित्र करने के लिये येन केन प्रकारेण लाये जा रहे हैं। 80 दिन से लाखों किसानआंदोलन कर रहे हैं, हर सप्ताह सोनार बांग्ला का सपना दिखाने का समय है मुकेश अम्बानी के पोते को देखने का समय है,पर 80 दिन से अपने द्वार पर आंदोलनरत किसानों से मिलने का समय नहीं है।

अन्तराष्ट्रीय छवि कितनी बढ़ा लीजिये पर राष्ट्रीय छवि का ह्रास होता जाएगा तो आपके नाम की लहर भी लहर में बह जाएगी।चुनाव के समय न जाने और कितने जुमले ले आएंगे और आपके जमूरे उन्हें ले कर एक बार फिर जनता को भरमाने की कोशिश करेंगे। यह तो भारत का दुर्भाग्य है और आप का सौभाग्य है कि यहाँ दलों का दल दल है, सबकी अपनी अपनी डफली है पर जिस दिन उनका राग एक हो गया तो आपके वैराग्य के दिन आ जाएंगे।

*एक बार एकान्त में चिन्तन कीजियेगा कि इतने बड़े ऐतिहासिक जन आंदोलन
में. जो 80 दिन से ठिठुरती ठण्ड में घर से सेंकडों कोस दूर, आप ही का बनाया कानून पसन्द न आने पर आप से गुहार लगा रहे हैं। आप शासक है, वो प्रजा है, वो आपकी सन्तान की तरह है,आप उनके लिये पिता तुल्य है, सम्मानीय है, माना वो भृमित है, कुछ उनको गुमराह कर रहे हैं,आपके इतने प्रचण्ड बहुमत के बावजूद वो कामयाब हो रहे हैं तो यह भी आपकी विफलता ही है। आपने कुछ कृषि विशेषज्ञों व प्रबुद्ध किसान प्रतिनिधियों व प्रमुख विपक्षी दलों को विश्वास में लिया होता, उनके अनुसार कानून बनाया होता तो यह आंदोलन करने की किसानों को जरूरत ही न होती। आपकी 2014 में जीत ऐतिहासिक थी तो यह आंदोलन भी ऐतिहासिक होता जा रहा है। अपने को प्रधानसेवक मुखिया कहने वाले नरेन्द्र मोदी जी इसी दृष्टि से सोच कर मेरी व मुझ जैसे करोड़ों देश हितचिंतकों की आप से विनती है।

उस नरेन्द्र को छोड़ आप ही नर इंद्र बनिये और ‘एक फोन की काल पर दूर हूँ ‘वाले जुमले को असली जामा पहनाते हुए पूर्वाग्रह को त्याग खुद आगे बढ़ कर किसानों को वार्ता पर बुलाइये,उसकी अगुवाई कीजिये यह मामला आधे घँटे में ही निपट जाएगा नहीं तो तू डाल डाल मैं पात पात, जिद्द और महाजिद्द, शह और मात का खेल कितने दिन, सप्ताह या महीने चलेगा, पता नहीं पर इस अवरोध को दूर न किया गया तो आपकी व भारतीयों की अंतरराष्ट्रीय छवि भी धूमिल होगी। आप राष्ट्र के प्रधानमंत्री भले ही कहलाते रहें पर सामान्य जन मानस के दिल से उतर जाएंगे।

अपने को वक्क्त के सिकन्दर कहने वाले कब वक्क्त के समन्दर में डूब जाएं! इतिहास बनाने वाले कब इतिहास बन जाएं कुछ पता नहीं चलता। गर ऐसा हुआ तो इतिहास बनने का एक कारण यह आन्दोलन भी होगा!

आप से जन जन की अपेक्षाओं पर पूरा उतरने की चाह लिये मैं हूँ एक आम नागरिक
(जिस ने अच्छे दिनों की चाहना की जुर्रत की थी)

-राजकुमार अरोड़ा गाइड

बहादुरगढ़( हरियाणा)
दिनाँक 12 फरवरी 2021

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