एक वर्ग परिघटना के तौर पर किसान-आंदोलन

श्रीनिवास खांडेवाल
दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसान आंदोलन को दो महीने होने जा रहे हैं। वे संसद द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। इन कानूनों को पहले अध्यादेश के रूप में लागू किया गया और बाद में कानूनों के रूप में बदला गया। वास्तविकता यह है कि इन कानूनों को पारित करते समय संसदीय मानदंडों का पालन नहीं किया गया। भारत के विभिन्न क्षेत्रों के और विभिन्न फसलों की खेती करने वाले किसानों के सरोकारों को ध्यान में नहीं रखा गया। अब सरकार कह रही है कि कानून के ऊपर बिन्दूवार विचार करने और कुछ संशोधन करने को तैयार है, इससे भी यही नजर आता है कि उसने हर कानूनों को बनाते समय किसानों के सरोकारों पर ध्यान नहीं दिया था।
किसानों और सरकार के बीच अब जो विवाद है उसकी मुख्या बाधा यह है कि किसानों का जो दृष्टिकोण है, सरकार की राय उससे सर्वथा विपरीत है।

किसानों की मांग है कि तीनों कानूनों को वापस लो और न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी जामा पहनाओ। सरकार और स्वयं प्रधानमंत्री का कहना है कि कानूनों को वापस नहीं लिया जाएगा. और न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी रहेगा, पर उसे कानूनी जामा नहीं पहनाया जाएगा। इस प्रकार परस्पर सर्वथा विपरीत दृष्टिकोण होने के कारण गतिरोध बना हुआ है।
कानून और उनके निहितार्थ
इन तीन कानूनों की आर्थिक विषयवस्तु से पता चलता है कि किसानों के विरोध का मूल कारण क्या है? एक विवादस्पद कानून हैः किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य ;संवर्धन एव सुविधाद्ध अध्यादेश 2020। इस कानून में मंडियों से बाहर व्यापारियों और राष्ट्रीय एव अंतर्राष्ट्रीय मूल्य-श्रृंखलाओं को व्यापार करने के लिए इजाजत, प्रोत्साहन एवं सुविधा प्रदान की गयी है। इस उद्देश्य के लिए एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केंटिंग कमेटियों ;एपीएमसी-कृषि उपज विपणन समितियोंद्ध को इजारेदारियों के रूप में वर्णित किया गया हैं। ऐसा दिखाया गया है कि इस इजारेदारी को खत्म कर प्रतिस्पर्धा और मुक्त व्यापार के दरवाजे खुल जाएंगे जिससे किसानों और व्यापारियों दोनों को फायदा पहुंचेगा। कहा गया है कि किसानों को मंडियों से बाहर किसी निजी मंडी में या खेत में या देश में कहीं भी अपनी उपज को बेचने की आजादी हो जाएगी। उसे कोई मंडी टैक्स या आढ़तियों का कमीशन आदि भी नहीं देना पड़ेगा।

कानूनों के समर्थकों के अनुसार, किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए अधिक विकल्प मिलेंगे। वे मंडियों से बाहर कहीं भी अपनी उपज बेच सकते हैंऋ वे निजी मंडियों में अपनी उपज बेच सकते हैं या खेत-खलिहान में ही बेच सकते हंै। इस प्रकार खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा पैदा होगी जिससे किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे, उनका मुनाफा बढ़ेगा। मंडी चार्ज या आढ़तियां कमीशन से निजात मिलेगी, उससे भी किसानों को फायदा पहुंचेगा।
उनके इस तर्क में अनेक गलतियां हैं। क्या एपीएमसी इजारेदारियां हैं? नहीं। वे न तो खरीदार हैं और न विक्रेता। वे लेनदेन को रेगुलेट करने के लिए स्थानीय रेगुलेटर हैं। मंडियों से बाहर ते किसानों को किसी प्रकार की रेगुलेटिंग सुरक्षा नहीं मिलेगी। एपीएमसी की प्रबंधन समिति में किसानों के प्रतिनिधि होते हैं और उनकी संख्या ही अधिक रहती है। आढ़तियां किसानों का शोषण करते हैं तो उसके निराकरण की जरूरत है।

आढ़तियां मंडियों में आने वाली उपज की मांग, आपूर्ति और विभिन्न व्यापारिक संस्थानों द्वारा किसान की उपज के पेश मूल्य आदि पर नजर रखते हैं। वे किसानों को जरूरत पड़ने पर कर्ज देते हैं, भले ही ब्याज अधिक लेते हैं परतु किसान को वक्त पड़ने पर )ण दे देते हैं। मंडियों में कीमतों को रोजाना तय किया जाता है, उसके लिए उनके अपने तरीके हैं-नीलामी लगाकर या लिखित स्लिपें जारी कर या गोपनीय उंगली के इशारे आदि के जरिये कीमतें तय होती हैं। इस प्रक्रिया मं किसान (विक्रेता पक्ष) और व्यापारी (मांग पक्ष) दोनों की बराबर की भूमिका होती है।

मंडी समितियां कीमतें तय नहीं करती। वे मूल्य तय करने की व्यवस्था, तोल, भुगतान और विवाद-समाधान का काम करती है। कीमतें तय करने में मुख्य भूमिका सूचना और पूंजी (व्यापारी और निर्माता) की शक्ति ही होती है। शेतकरी संगठन (जिसके नेता शरद जोगी हुआ करते थे), कतिपय अन्य संगठन और अब भारत सरकार एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केटिंग कमेटियों को ‘‘बूचड़खानों’’ और इन नए कृषि कानूनों को ‘‘दूसरी आजादी’’ का नाम दे रहे हैं। परंतु इन कानूनों के जरिए जिस चीज को आगे बढ़ाया जा रहा है वह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कारपोरेट को एक बेलगाम बाजार मुहैय्या कराने का काम है जहां वे जैसे भी चाहें किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को लूटें। किसान इस बात को समझ गए हैं, अतः आंदोलन कर रहे हैं। किसान समझ गए हैं कि इन कानूनों का बुनियादी मकसद उनके हितों के खिलाफ है, अतः वे इन कानूनों को वापस लिए जाने की मांग कर रहे हैं।
दूसरा कानून हैः किसान (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवा पर करार कानून, 2020। इस कानून में किसान और किसी कृषि-विपणन कंपनी या किसी विशालकाय राष्ट्रीय/ अंतर्राष्ट्रीय कारपोरेट के बीच फाॅर्मिंग काॅन्टैक्ट (अनुबंध खेती) का प्रावधान है। कंपनी किसान को कृषि निवेश-बीज, खाद, उर्वरक आदि प्रदान करेगी और उसे तकनीकी सेवाऐं देगी और ठेके के अनुसार उनकी कीमत वसूल करेगी। ठेके में कीमत भी तय होगी अतः इसे ‘‘मूल्य आश्वासन’’ का नाम दिया गया है। दावा किया जा रहा है कि इसमें किसान को कृषि निवेश की चीजें मिलेंगी और कीमत भी तय रहेगी जिससे कीमत के बारे मंे कोई अनिश्चितता नहीं रहेगी और इस तरह किसान सशक्त बनेगा।
इस कानून के संबंध में तीन बातों पर गौर करना जरूरी हैः 1. जमीन पर कब्जे का सवाल, 2. ठेके में किसान को और अधिक सुरक्षा, और 3. न्यूनतम समर्थन मूल्य का सवाल।
वार्ता के दौरान और अन्यत्र, सरकार का कहना है कि विपक्ष की पार्टियां किसानों को गुमराह कर रही हैं कि ठेके की सभी बातों का पालन करने में विफल रहने पर जमीन किसान के हाथ निकल जाएगी। सरकार कह रही है कि काॅन्टैक्ट उपज के संबंध में होगा, जमीन की मिल्कियत के बारे में नहीं। हो सकता है यह कथन सही हो। पर ठेका खेती में असल में होता यह है कि किसान को कृषि निवेश और तकनीकी सेवा के एवज में जो पैसा देना पड़ेगा, उसमें धीरे-धीरे वृद्धि हो जाती है और किसान को होने वाला फायदा कम होता चला जाता है और अंत में किसान कर्जदार हो जाता है. और इतना कर्जदार हो जाता है कि वह स्वयं ही जमीन को बेचने पर मजबूर हो जाता है और मजदूर बनकर रह जाता है।
‘‘1935 से लेकर 1985 तक अमरीका में छोटे किसानों की संख्या 6.8 मिलियन से घटकर 2.8 मिलियन रह गयी….जैसे-जैसे किसान अपने खेती के धंधे से बाहर हो गए, वैसे-वैसे स्थानीय सप्लाॅयर, कृषि उपकरणों के डीलर और किसानों के साथ जुड़े अन्य छोटे कारोबारी भी खत्म होते चले गए। पूरे के पूरे ग्रामीण समुदायों का नाम-निशान नहीं बचा। जबकि बड़े कृषि कारोबारी कारपोरेटों की ताकत बढ़ गयी।’’ (व्हैन कारपोरेशन्स रूल द वल्र्ड, लेखक, कोर्टन डेविड सी. पृष्ठ 224)

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