वैश्विक सत्ता में शिफ्ट-अमरीका के सामने घुटने टेक रहा है भारत

डी. राजा
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछले दिनों आयोजित जी-सात शिखर बैठक में आभासी तरीके से शामिल हुए। जुमलेबाजी के लिए जाने जानेवाले हमारे प्रधानमंत्री ने अमीर देशों की इस शिखर बैठक में भी ‘‘एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य’’ का जुमला उछाला।

विडम्बना ही है कि जो प्रधानमंत्री अपने स्वयं के लोगों को कोरोनारोधी टीका मुहैय्या कराने की अपनी जिम्मेदारी से काफी देर तक दूर भागते रहे और इसकी जिम्मेदारी को राज्यों के ऊपर थोपने की कोशिश करते रहे, तिकड़म करते रहे कि राज्य टीके की ऊंची कीमतें दें और वैक्सीन निर्माता कंपनियों को भारी मुनाफा हो, वही विश्व पटल पर इस तरह की जुमलेबाजी कर रहे थे।

इस घटना से हटकर देखें तो भारत को अमीर देशों का बहुत करीबी दिखाने की उनकी आतुरता और पश्चिम के देशों के दक्षिणपंथी नेताओं के साथ इतनी गलबहियांे की क्या वजह है। जब से वह सत्ता में आए हैं गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शिखर बैठकों से उनकी दुनिया को नजर आने वाली गैर-हाजिरी के चलते यह प्रश्न और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

जब उनके मित्र समझे जाने वाले अनेक लोगों ने मानवाधिकार उल्लंघनों, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उनकी विफलता और धारा 370 के खत्म करने के उनके कदम, राजद्रोह कानून के बारम्बार प्रयोग जैसी बातों की आलोचना की तो उन्होंने केवल एक बाद गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संपर्क समूह की एक बैठक में आभासी तरीके से हिस्सा लिया।

इस प्रश्न का उत्तर दो तरह से मिलता है। एक तो उनके उस शब्दाडम्बर, जिसके बाद उनके चेले उन्हें इतने बड़े आदमी की तरह पेश करने लगते हैं जितने वह हैं ही नहीं। दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण बात का संबंध पूंजीवाद के ढांचागत भूमंडलीय संकट से है जो प्रधानमंत्री और अमीर देशों में उनके तमाम मित्रों के लिए खतरा पैदा कर रहा है। संकट इस अर्थ में ढांचागत है कि यह पूंजीवाद की प्रकृृति में ही अन्तर्निहित है और पूंजीवाद ने जब तक हो सकता है केवल उसे टालने की कोशिश की है।

1970 के वर्षोंं के बाद से इजारेदार पूंजी उन्नत देशों में बहुत मामूली सा मुनाफा कमा रही है और अमीर देशों और उनके अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे मददगार इकोसिस्टम के लिए यह चीज भारी चिंता का विषय रही है। ऊंचे मुनाफों की तलाश में विकासशील देशों की निवेश पूंजी बढ़ी है और निजीकरण और शोषण में वृ(ि हुई है जिसके फलस्वरूप जनता के रहन-सहन के स्तर और रोजी-रोटी के अवसरों में कमी आई है।

जब सोवियत संघ का बिखराव हुआ और वहां समाजवादी व्यवस्था खत्म हुई तो नवउदारवादी पूंजी के समर्थकों ने यह घोषणा करने में देर नहीं लगायी कि ‘‘इतिहास का अन्त’’ हो गया है। पर स्वयं इतिहास ने उनके दावे को झुठला दिया क्योंकि बाद में देखने को आया कि राज्य द्वारा समर्थन के बाद ही पूंजीवाद एक के बाद दूसरे संकट से बाहर निकला है।

परंतु इस प्रक्रिया में पूंजीवाद इस पृथ्वी वासियों के लिए और भी अधिक वहशी और क्रूर हो गया, क्योंकि उसने लोगों की रोजी-रोटी को तबाह किया, पर्यावरण को तबाह कर दिया और इतना बर्बाद कर दिया कि पहचान में भी नहीं आता।

चाहे पूर्व एशिया संकट रहा हो, 2008 का वित्तीय संकट रहा हो या कोविड-19 महामारी से पैदा हुआ आर्थिक एवं सामाजिक संकट हो, यह स्पष्ट हो गया है कि पूंजीवाद अपनी सीमाओं को पार कर चुका है और इस चीज ने पूंजीपतियों और विश्वभर में उनके मददगार नेताओं के बीच बेचैनी पैदा कर दी है। प्रधानमंत्री भी उन नेताओं में हैं।

पूंजीवाद की विफलता के कारण मजदूर वर्ग के बीच भी व्यापक स्तर पर बेचैनी है। बेरोजगारी, बेहद कम मजदूरी, खराब कार्यदशाएं और सामाजिक सुरक्षा का अभाव-ये ऐसे मुद्दे हैं जिनसे मजदूर वर्ग में चिंता है। मजदूर वर्ग की इस बेचैनी का इस्तेमाल दक्षिणपंथ और मोदी एवं बोल्सोनारो जैसे लफ्फाज नेताओं के सामने उन्हें घुटने टेकने के लिए मजबूर करने के लिए किया जा रहा है।

कथित ‘मुक्त’ बाजार पर विचारधारात्मक भरोसा नवउदारवादी सिद्धांत का अभिन्न अंग था। उदात्त किस्म के नारे लगाए गए कि नवउदारवाद से भूमंडलीय तौर पर एकीकृत मुक्त बाजार से जो समृ़द्धि एवं सम्पन्नता पैदा होगी, रिस-रिस कर उसका फायदा समाज के गरीब लोगों तक पहुंचेगा। गरीब लोगों तक कोई फायदा नहीं पहुंचा बल्कि पिछले पांच दशकों मं आर्थिक असमानता में भारी वृद्धि हुई है।

थोमस पिकेटी और उनके साथियों ने फैसलाकुन तरीके से साबित किया है कि नवउदारवाद के बाद आर्थिक असमानता में तेजी से वृद्धि हुई है। शीर्ष के कुछ लोगों के हाथ में अथाह धन-दौलत का संकेन्द्रण हो गया है जबकि गरीब लोग और भी अधिक कंगाल हो गए हैं।

भारत समेत विकासशील देशों में असमानता की यह समस्या और भी अधिक विकट है। मुक्त बाजार के अनिश्चियपूर्ण वातावरण में कुछ ऐसे द्वीप बन बए हैं जहां इजारेदार पूंजी अपेक्षाकृत ऊंचे मुनाफे कमा रही है।

भारतीय राज्य ने पूंजीपतियों को सुपर मुनाफे कमाने के लिए तमाम तरह की सुविधाएं प्रदान की हैं। यहां तक कि कोरोना के लिए जीवन रक्षक टीके के मामले में भी पूंजीपतियों को भारी मुनाफा कमाने का मौका दिया जा रहा है।

पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं के साथ भारत का यह इन्टीग्रेशन चंद दशक पहले शुरू हुआ और अब जब प्रधानमंत्री अमीर देशों के साथ गलतबहियां करते हैं तो वह भारत के लिए घाटे का सौदा होता है। असमान और मजदूर वर्ग के लिए विनाशकारी शर्तो पर सौदे किए जाते है। आलोचना और राज्य के पूंजीवादी हित को चुनौती देने से हाल के दिनों में लोगों को भारी मुसीबतों का शिकार होना पड़ा है, अधिकारों के उल्लघन हुए हैं।

भारत की जनता के हितों को पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं का पिछलग्गू बनाए जाने से न केवल आर्थिक कठिनाइयां बढ़ी हैं बल्कि बहुत हद तक लोकतंत्र का क्षरण भी हुआ है। ऐसे समय जब जोर सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण, राष्ट्रीय परिसम्पत्तियों को बेचने, भारतीय रिजर्व बैंक और जीवन बीमा निगम जैसे वित्तीय संस्थानों को कमजोर करने पर है और सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार का अभाव एक कड़वी हकीकत बन चुका है तो जनता के मुद्दे- जनस्वास्थ्य, शिक्षा एवं आवास तक पहुंच और आबादी के कल्याण के लिए आवश्यक कामों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हम अपने चारों तरफ जो कुछ देखते हैं वह है बीमारी, मौत, भूख, गरीबी और बेरोजगारी। इन सबसे जो बात सामने आती है वह है कि पूंजीवादी हितों की रक्षा करना ही राज्य का सबसे बड़ा धर्म हो गया है। जैसा कि एक बार समीर अमीन ने कहा था ‘‘साम्राज्यवादी देशों में इजारेदारी पूंजी को राज्यतंत्र की जरूरत होती है। उन्होंने एकमात्र अपने हितों की खिदमत के लिए राज्य को अपना पालतू नौकर बना लिया है।’’

इस संदर्भ में पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं की तरफ भारतीय राज शासन का झुकाव भारत के मजदूर वर्ग और किसानों के अधिकारों एवं हितों के लिए स्पष्टतौर पर हानिकारक है। यह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक घातक कारक बन गया है। भारत की आबादी के कल्याण की कीमत पर कार्पोरेट और बडे बिजनेस के हितों की रक्षा करने के लिए आर्थिक और विदेश नीति के मामलों में भारत अपनी स्वतंत्रता को बलि चढ़ा रहा है।

विदेशी मामलों में भारतीय हितों को अमरीका के अधीन किया जाना भारत को इस क्षेत्र में अमरीकी हितों का एक साधन और गारंटर बनने की दिशा में अधिकाधिक ढकेल रहा है। इससे रूस जैसे समय परीक्षित सहयोगी देश और चीन से हमारे संबंध खराब हो रहे हैं। हाल में जी-7 देशों की मीटिंग तथाकथित चीनी प्रभाव को कम करने और उसके बेल्ट एंड राॅड इनीशेेटिव को कमजोर करने के लिए ‘‘बिल्ड बैक बैटर वल्र्ड’’ ;फिर से एक बेहतर दुनिया बनाओद्ध की योजना पर सहमत हुई।

एक यथार्थवादी नजरिये से देखें तो जी-7 और जी-22 जैसे संगठन पिछले दशकों में भूमंडलीय आर्थिकी के गतिशील विकास के प्रतिनिधि नहीं हैं। इस प्रकार वह वास्तविकता के सम्पर्क से बाहर हैं। अमरीका और चीन की अर्थव्यवस्थाओं के बीच अंतर कम होने से पश्चिमी विश्व आशंकित और असहज हो गया है क्योंकि रूस के बिखराव के बाद पश्चिम के देशों का जो आधिपत्य चल रहा है उसे यह पहली गंभीर चुनौती है। अपनी भू-राजनीतिक लाभप्रद स्थिति के साथ रूस आज भी एक बड़ी शक्ति है। दोनों तरफ से उकसावों और व्यापार युद्ध के फलस्वरूप दुनिया एक नये शीत युद्ध निकटतर आ रही है, और भारत अपनी स्वयं की जनता के हितों पर ध्यान देने और एक न्यायसंगत एवं समावेशी भूमंडलीय व्यवस्था का समर्थन करने के बजाय अमरीकी हितों के साथ जुड़कर विवाद का एक उपसाधन बन रहा है।

इस क्षेत्र में शांति बनी रहे, इसके लिए भारत को एक स्वतंत्र नीति अपनाना चाहिए और अमरीका एवं पश्चिमी शक्तियों के एजेंडे-जो अत्यन्त असमान और अनुग्रहकारी पार्टनरशिपों का निर्माण कर रहा है-के सामने घुटने टेकने के बजाय भूमंडलीय दक्षिण की चिन्ताओं एवं सरोकारों के लिए मुखर होना चाहिए अन्यथा भारत की जनता और उनके हितों को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। अपने राष्ट्र और जनता के हितों की रक्षा के लिए वामपंथ और लोकतांत्रिक ताकतों को इसे एक चुनौती के रूप में लेना चाहिए और इस प्रक्रिया का विरोध करना चाहिए।

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