शिक्षा एवं शिक्षक आन्दोलन के प्रखर योद्धा, हमसफर केदारनाथ पाण्डेय

विचार—विमर्श

प्रतापनारायण सिंह

बड़े गौर से सुन रहा था जमाना
जब तुम्हीं सो गए दास्तां कहते-कहते

18 अक्टूबर विजयवाड़ा (आन्ध्रप्रदेश) के एतहासिक प्रशाल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का 24वां राष्ट्रीय सम्मेलन समापन की ओर बढ़ रहा था। मैं महासचिव (बी.एस.टी.ए.) प्रसाद सिंह के बगल में बैठा कायक्रर्म को देख रहा था। तभी महासचिव का मोबाईल बजा। उनके मुख से सिर्फ इतना सुन पाय की मेदान्ता। महासचिव के चेहरे पर उदासीनता की रेखा दिखी। मैने उनसे पूछा की मेदान्ता! क्या बात हुई। रूंधे स्वर मे उन्होने मुझसे कहा कि पाण्डेय जी (अध्यक्ष बी. एस. टी. ए.) को दिल का दौड़ा पड़ा है, वे दिल्ली के मेदान्ता अस्पताल में आई.सी.यू. में हैं तब से मैं भी इस समाचार से मर्माहत हो गया। आशा भरी चिंता! दूर हो गई की वे पुनः चंगा हो जाएंगे। महासचिव लगातार उनके पुत्र छोटू के साथ सम्पर्क बनाये हुए थें। जब विजयवाड़ा से 20 अक्टूबर को मैं पटना आया। 21 अक्टूबर को महासचिव के साथ गाड़ी से बेगूसराय के लिए प्रस्थान करने वाला था, तभी विधानपार्षद प्रो0 संजय जी का फोन आया, उन्होने महासचिव से विधान परिषद भवन होते हुए ही बेगूसराय जाने का अग्रह किया उनके साथ मै भी विधान परिषद के पाण्डेय जी के ‘‘निवेदन समिति’’ कक्ष में गया। वहाँ प्रो0 संजय जी बैठे थे। इसी बीच फिर दिल्ली से बु़द्धदेव जी (निजी सहायक) को फोन छोटू ने दिल्ली से किया कि अब सुधार हो रहा है। यह समाचार सबों के लिए सुखद था। इसी खुसखबरी के साथ हम दोनों बेगूसराय के लिए प्रस्थान कर गए। अचानक 24 अक्टूबर को मनहूस खबर से मर्माहत हो गया।

केदानाथ पाण्डेय के साथ शिक्षक आनदोलन से लेकर उनके निधन से पूर्व 40 वर्षो से उनके साथ रहने का मौका मिला था वे एक कुशल शिक्षक थे। उनकी 10वी एवं 11वीं कक्षा के लिए भूगोल पुस्तक भारती भवन से प्रकाशित हुई थी उसी दौर में जब उनसे पटना में भेंट हुई तो उन्होने उस पुस्तक की चर्चा की थी। मैं भूगोल विषय का शिक्षक नहीं था लेकिन अपने विद्यालय बागवाड़ा के भूगोल विषय के शिक्षक से उस किताब को विद्यालय मै बच्चों को उस से लाभांिन्यत होने लिए अपने सहयोगी से कहा तब से जब तक विद्यालय मे कायरत रहा पाण्डेय जी की ही भूगोल की पुस्तक मेरे विद्यालय में पढ़ाई जाती रही।
शिक्षक आनदोलन 1972 में जब राज्य स्तर पर चल रहा था तब पाण्डेय जी भी जमाल रोड में संघर्ष के रूप में लगातार सक्रियता के साथ आनदोलन में भाग लेते रहें थे। मेरी नजर उन पर तब पड़ी जब मै प्रेस विज्ञप्ति उनको लिखते देखा था। उनकी लिखावट एवं उनकी भाषा का कायल मैं तभी से बन गया महासचिव की भी दृष्टि उनकी विद्ववता की ओर गई। सर्वप्रथम साहेबगंज में जब बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ का राज्य सम्मेलन हो रहा था, तब केदारनाथ पाण्डेय का नाम बी.एस.टी.ए. की कालजयी पत्रिका ‘‘प्राच्य प्रभा’’ के संपादक के रूप में उनका चयन किया गया।

जब 1976 में प्रसाद सिंह बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के महासचिव निर्वाचित हुए, तब से पाण्डेय जी और उनके बीच लगातार शिक्षकों की समस्या तथा शैक्षिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिए तरह-तरह के कार्यक्रम का आयोजन होने लगा। एक दौर ऐसा आया जब पाण्डेय जी महासचिव निर्वाचित हुए उनहोंने राज्य स्तर पर शैक्षिक परिषद का गठन किया जिस मे मुझे एक सदस्य के रूप में मनोनीत किया शैशिक परिषद के तमाम बैठको में भाग लेकर राज्य के विद्यालयों में शिक्षा का स्तर कैसे ऊँचा उठाया जाए, अपने धनी अनुभवों से हमलोगों को पे्ररित करते थें।

संयोग से उसी अवधि में मैं बेगूसराय जिला माध्यमिक शिक्षक संघ मे शैशिक संघ का संयोजक बना था। जिला स्तर पर 3 दिनों का शैक्षिक परिषद की ओर से कार्यशाला का आयोजन किया गया था।
पाण्डेय जी ने तत्कालीन बिहार के शिक्षा विभाग के निदेशक सी़. के. मिश्रा (भा. प्र. से.) के द्वारा हीे बेगूसराय में शैक्षिक परिषद द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय कार्यशाला को उद्घाटन करवाने में सहयोग किया था।

बिहार के शिक्षको के लिए यह सौभाग्य की बात थी कि पाण्डेय जी के अंदर एक शिक्षकत्व का गुण तथा दुसरा शिक्षक की सुबिधा के लिए सतत संघर्षशीलता ये दोनों गुण उनके अंदर था। शिक्षकों की लोकप्रियता ने ही उन्हें सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से विगत के चुनाव में उन्हें चैथी वार विधान परिषद में भेज कर बिहार के शिक्षकों के गौरव को बढ़ाया था।

उनके व्यकिगत जीवन में विगत के वर्षो से लगातार मुसीवतों का पहाड़ टूटता रहा, बावजूद इसके वे शिक्षकांे की सेवा करने से कभी विमुख नहीं हुए। मेरी एक पुस्तक ‘‘ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’’ का लोकार्पण
30 अगतस्त 2021 को जमाल रोड स्थित मध्यमिक शिक्षक संघ के सभागार में करने की स्वीकृति ‘‘श्री हरिवंश’’
राज्य सभा के उप सभापति ने दी थी, तब मैनें पाण्डेय जी से ही बात कर के शिक्षक संघ के सभागार की सुकृति की बात की, उन्होने कहा ये भवन आपका ही है इसमें स्वीकृति की क्या जरूरत है। तब मैंने उनसे आग्रह किया कि सभा गार में शिक्षको की अच्छी उपस्थिति हो, इसकी भी व्यवस्था करेगेें। उनहोनें कहा

संयाग अच्छा है, 28 अगस्त को राज्य भर के जिला सचिवों की बैठक है। उनसे आग्रह करूँगा कि एक दिन रूक कर पुस्तक के लोकार्पण में भाग लें। यही हुआ। भी 29 अगस्त को जनशक्ति परिसर में जनशक्ति साप्ताहिक संपादक मंडल की बैठक होने वाली थी, मैं भी पाण्डेय जी के साथ संपादक मंडल का सदस्य था। बैठक समाप्ति के साथ पाण्डेय जी ने मुझे कहा की आप अपनी पुस्तक पहले दे दें। जिसे रात मंंे पढ़ कर लोकार्पण के समय उसकी चर्चा कर सकूँ। जब जिला सचिवों की बैठक में सामिल होने के लिए वेे अपने कक्ष से जा रहे थे। तो मैने उनके हाथ में दर्जनों अमंत्रण पत्र शिक्षक संघ के जिला सचिवों कों देनें के लिए उनके हाथ में दे दिया। सहर्ष उन्होंने मुझसे कहा सभी जिला सचिवों के हाथ में दे दूँगा। ये उनकी महानता थी। मेरा जब दिल्ली में आॅपरेशन हुआ था तो घर आने पर मैने उनसे कहा कि शिक्षा विभाग से सरकारी सहायता दिलवाने में मदद करेगें। उनकी महानता का मैं कायल हूँ उन्होनंे कहा का आप आवेदन पत्र भर भेजवा देेगें। यह मेरा कार्य है जब वे महाचिव या विधान पार्षद नहीं बने थे तब उनकी बेटी की शादी उनके ही गाँव कोटवा नारायणपुर (उत्तर प्रदेश) मे आयोजित थी तत्कालीन महासचिव चन्देश्वर प्रसाद सिंह के साथ उनके गाँव जाने को मुझे भी मोका मिला था। उनकी विद्वता एवं उनकी प्रगतिशीलता देखते हुए जन शक्ति साप्ताहिक पत्रिका को ऊँचा उठाने की दृष्टि से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बिहार राज्य परिषद के सचिव का0 रामनरेश पाण्डेय ने उन्हें सम्पादक मंडल के सदस्य के रूप मनोनित किया था।

उन्होनें न केवल शिक्षा के स्तर में सुधार लाने के लिए विधान परिषद के अन्दर और बाहर अजीवन संघर्ष करते रहे, बल्कि झुगी-झोपड़ी की गंदगी कवाड़ खाने की अवाज बन कर भी खड़े दिखते रहे। आॅर्वेल की तरह भविष्य वक्ता के रूप में दिखते रहे हैं। वे हमेशा शिक्षक के चरित्र निर्माण पर जोर देते रहें। वे सत्यता का मंत्रालय के प्रबल पक्षधर रहे शिक्षा के अन्दर समाचार, मनोरंजन, शिक्षा एवं ललित कला का समावेश चाहते थें। वे प्रेम का मंत्रालय के भी प्रबल पक्ष वे शिक्षा जगत में साहिर लुधियानवी की इस पंक्ति के साथ अपने को खड़े दिखते है

कावे में रहो या काशी में, निस्वत तो उसी की बात से है
तुम राम कहो कि रहीम कहो, मतलब तो उसी की बात से है।

पाण्डेय जी इस बात के प्रबल समर्थक थे की समाजवाद, पुँजीवाद का बहुवचन है। वे संसद के कथनी और
करनी पर लगातार प्रतिरोध व्यक्त करते रहे हैं वे धूमिल के इस पंक्ति के सबल समर्थक रहे है –

भाषा का तिकड़मी दरिन्दे का कौर है
जो सड़क पर और है, संसद मंे और है

इसलिए बाहर आ! संसद के अंधेरे से निकलकर, सड़क पर आ!
वे हमेशा धूमिल की इस पंक्ति को अपने भाषण में व्यक करते थे कि –
लोहे का स्वाद, लोहार से मत पूछो उस घोड़े से पूछो जिसके मुँह मंे लगाम है।

मै अपनी ओर से अलविदा होने वाले शिक्षक एवं शिक्षा के रहनुमा, समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों की समस्याओं के निदान के लिए संघर्षरत जीवन जीने वाले लेखक, विचारक, शिक्षक आन्दलन के योद्धा दशकों तक विधान पार्षद साथी को सलाम!

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